Love-Real & Imaginary

Wait

Waited a long time…..
Creating memories separately, truely,
Freckled down her eyes, ignited a brown flame of believe,
Oh! How beautiful this can be … waiting for someone, lonely nights, silent days like death.
Hollowness! Echos of his footsteps sounds twice clearer than in.
Very edges of the feelings, plotted a continuous graph on.
Love! A wonderful theory,
Desire! An obvious lemma.
Drove into the ocean of their emotions,
Perfectly, peacefully, precisely, panically.

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Dimension of Life.

स्वयं

उस गहरे अंधकार में कौन है वहाँ ?
कुंठित किन्तु अविचलित व्यतीत होता हुआ।
बैठा है या उड़ रहा है?
विराम में है या फैल रहा है।
कौन हो तुम? हे विचित्र!
कोई प्राणी हो या अपारदर्शी स्वरूप?
स्त्री हो या पुरुष, या बस एक अमूर्त चिंतन प्रारूप।
यह लाल रंग सा द्रव समान क्या है?
रक्त है या अश्रुपूर्ण मनुष्य के व्याकुल नैन?
पीड़ा में हो तुम या ज्वाला है कोई फूट रही।
हँसी है ये तुम्हारी या व्यंग्यात्मक रचना का कोई पाठ।
कौन हो तुम? क्या करना है तुमको?
ज़िन्दा हो तुम या आयतन कोई फैल रहा,
मर सकते हो तुम या वृत्त की परिधि है तुम्हारी आयु?
किस प्रकार हो तुम?
धनात्मक हो या ऋणात्मक, या अपरिभाषित?
मैं पूछता हूँ, कौन हो तुम?
ऊपर जा रहे हो या गुरुत्व का विरोध कर रहे हो तुम।
पूर्णांक हो या कोई सार्थक जीवन का प्रमाण?
दशमलव के बाद हो या मृत शरीर का भटकता प्राण?
मैं अब भी पूछ रहा हूँ, कौन हो तुम?

Dimension of Life.

Regret : Weapon blessed with a curse

Someday.. In a city, in a home..
In a closed door of washroom…
Shower opened, silence burst into tears with.
Reddish eyes, running nose, holding breathe,
were creating a collage of failures.
“You could have everything, you don’t have.
It’s all your faults, all your wrongs.
Now you are done. Huge applause!
Weldone! You looser!
Now listen carefully.
You’re alone. Accept it, live it, feel it.
You have to do everything,that is why i am here with you, over and over again.
I am Regret. Regret, your reminder.
Stop crying you drama!
You have the power to put someone on their knees to stop you.
You are the darkest – fastest light spreading in nano seconds everyone upon.
You have the potential to make someone cry for you.
Today, i am here with you.
Tomorrow with those who left you.
Who made you cry, who let you go.
But for now, stay with me, hold my hand.
Shut up! Go on! Common!…..”

Love-Real & Imaginary

कुछ कहने को नही आज तुझसे

कुछ कहने को है नही आज तुझसे,
चलो अपनी एक साँस भेज दूँ।
वादा करो जो पढ़ पाओ तो,
मैं अपना एहसास भेज दूँ।
खामोश पन्नों पर उतारे थे मैंने कुछ लफ्ज़ जज़्बातों के,
चलो आज तुम्हें वही अल्फाज़ भेज दूँ।
रातों के सूनेपन में जब टपकती हैं आँसू की बूँदें
उठती है कसक कहीं दिल में कहीं धड़कन की गूँज।
बनती है जो मेरे गम से कोई नई सरगम,
अगर तुम कहो तो वो साज़ भेज दूँ।
कँपकँपाती पलकें जब धीरे से खुलती हैं,
तब छाया रहता है बस घना सा अँधेरा,
दूर तक राहों में बस अपनी परछाई दिखती है,
ऐसे वक्त पर काँप उठती है मेरी रूह,
और ये देखो काँप उठी है मेरी नब्ज़,
तुम कहो तो ये आभास भेज दूँ।
सपनों के मोती टूटकर यहीं बिखरे हैं,
नही है हिम्मत मुझमें, नही कोई ताकत
कि इन्हें फिर से चुनकर सजा दूँ,
बस रह गई है थोड़ी सी, किसी कोने में पड़ी हुई
रुको, अभी ढूंढकर वो आस भेज दूँ।
मेरी सहेली निराशा मिलने आया करती है,
वक्त-बेवक्त वो मुझे सताया करती है,
अब तुमसे तो मुलाकातें भी नही होती है,
और तो और दो-चार बातें भी नही होती हैं,
बतलाने से जो खत्म न होगी
आज वही तुम्हें राज़ भेज दूँ।
उधर अब भी कोई त्योहार होता होगा,
हर घर के कोने में बहार होता होगा,
उधर अब भी निकलता होगा चाँद और सितारा,
अब भी होगा कोई मन्दिर, मस्जिद और गुरुद्वारा,
मेरे लिए भी कुछ चढ़ा देना वहाँ,
चलो थोड़ी पूजा और नमाज़ भेज दूँ।
आज तुम्हारी बस्ती बहुत मशहूर हो गई,
आज मेरी बस्ती मीलों दूर हो गई।
तुम मशगूल हो वहाँ कहीं और पे,
मैं महफूज़ हूँ यहाँ चारों ओर से,
कुछ बीते पल के हिस्से और कुछ तुम्हारे किस्से
बन्द कर के रखें हैं मैंने जिसमें,
वो दराज़ भेज दूँ।
तुम्हारा तो रोज़ आना-जाना होगा,
हर दिन एक नया जमाना होगा।
आज शीशे में खुद को देखा तो सोचा,
कितने दिन बीत गए हैं चलो कुछ नया कर लूँ,
तब फिर मैंने बालों को सँवारा देर तक निहारा।
तुम तो भूल गए होगे वो लाल ओढ़नी मेरी,
अच्छा बदल रही हूँ आज,
मैं जो, वो लिबास भेज दूँ।
अब सारी बातें मैं कर रही हूँ खतम,
अब यादों की गहराई में मैं हो रही हूँ दफन।
यहाँ फिर से कही जायेगी किसी हीर की कहानी,
यहाँ फिर से कहलाएगी मीरा कृष्ण की दीवानीं,
अब हो गया है खंडहर ये आशियाना मेरा,
जो बनेगा मेरा महल – ए-ताज़ भेज दूँ,
साँस भेज दूँ, साँस भेज दूँ,
पढ़ पाओ तो अपना एहसास भेज दूँ।

Love-Real & Imaginary

हवाओं का इशारा

कुछ अलग सी थी आज की हवा,
न जाने ये कब, कैसे और क्यों आयी
उस पल मैं ये समझ न पायी,
मुझे अनजानी राहतें दे गयी वो,
अपने आप में खोने को मजबूर कर गई वो
फिर साँसें चलते-चलते रुकने लगी थी,
कुछ समझने के लिए मैं हवाओं के पीछे भगी थी।
अचानक वो बालों को मेरे सहलाकर, कानों में कुछ कह सी गई,
मैं हैरान परेशान अपने सवालों की किताब लिये रह सी गई।
जब वो मुझे यूँ छोड़कर गई, तब मैं खड़ी चुपचाप बेताब थी।
तभी खिड़कियों की खड़कती आवाज से आँखें खुल सी गई।
मैंने पूछा – “क्या मतलब है तुम्हारा, क्यूँ मुझे यूँ छोड़कर गई?”
उस हवा ने आकर मेरे हाथों की ठंडक को महसूस कराया,
तब मैं समझी उस अपनेपन के एहसास को जो सिर्फ तुम्हारी थी।
आँखें खुशियों से भरी, होंठों की कँपकपी हँसी, कैसी वो खुमारी थी।
अचानक बाँहों की गर्माहट ने याद दिलाया कि हवा तो आगे बढ़ गई थी।
मैं हवा को ढूंढते आगे बढ़ती गई, अपने दिल के सवालों के जवाब की बेचैनी चढ़ती गई।
कहीं पेड़ों की झुरमुट की सनसनाहट से मेरे कदम रुके,
वहीं हवा कातिल सी हँसी, मैं फिर से अपनी चाहत से उसकी बातों में फँसी।
मैंने पूछा – “क्या मतलब है तुम्हारा, क्यूँ मुझे यूँ छोड़कर गई?”
तभी उन पेड़ों के पत्तों ने अपने हाथ हिलाये
तुम फिर मुझे याद आये।
जब कोई न मेरे साथ था, पर साथ मेरे हमेशा थे तुम्हारे साये।
तभी पेड़ों में फँसे दुपट्टे को अपने मैंने खींचा
हवा को वहाँ न देखकर, मैंने किया उसका पीछा।
पर वो बेदर्द हवा न मिली मुझे, फिर मुझे मेरे आशियाने ने अपनी तरफ खींचा।
कुछ देर बाद हाथों में चाय का प्याला लिए
मैं खड़ी कुछ बुदबुदायी, फिर दरवाजे की दस्तक से मैं थोड़ा घबराई।
चाय की एक राहत वाली चुस्की ले मैंने दरवाजे को खोला,
मुझे गुस्से में देख हवा ने अपना मुँह खोला –
जानना नही चाहोगी अपने दिल की बात, क्या तुम्हारी चाहत भर गई।
मैंने पूछा – “क्या मतलब है तुम्हारा, क्यूँ मुझे यूँ छोड़कर गई?”
अचानक मेरे अधखुले बाल आँखों से हटते गये,
तुम फिर से मेरी यादों में बसते गये।
याद आई वो तुम्हारे हाथों की नर्म स्पर्श,
जब मैं रोती गई और तुम मेरे आँसू पोंछते गये।
तभी चाय के प्याले से मेरा हाथ टकराया
और मैंने हवा को वहाँ न पाया।
फिर मैंने सोच लिया, नही जाऊँगी उस बेरहम हवा के पीछे।
हाथों को सेंकने के लिए मैं बैठ गई नीचे।
जलते कोयले से उठता धीमा धुँआ हवा के आने से इधर उधर होने लगा।
मैंने कहा – “तुम मुझे न बैठने दोगी चैन से,
तुम्हें दिखते नही मेरे आँसू निकलते नैन से।”
हवा की उल्टी दिशा ने संकेत दिया कि वो इस बात से अनजान है या फिर मेरी हरकत से हैरान है।
मैंने पूछा – “क्या मतलब है तुम्हारा, क्यूँ मुझे यूँ छोड़कर गई?”
तभी मेरे दिल से आवाज आई कि मैं उसे ही न जान पायी।
जो मेरे मन के करीब, मेरी साँसों के करीब, मेरी आँखों में बसा था।
उसके सहज होठों की हँसी, उसकी बातें,
उसके पास होने का एहसास।
बस तुम, बस तुम ही तो थे उस हवा का इशारा,
उसने ही बदला मेरी दुनिया का नज़ारा।
उसे कैसे मैं समझ न पायी।
पर उसने मुझे तुम्हारे करीब होने का हकीकत दिखाया।
सिर्फ तुमसे मैं जुड़ी रहकर खोना चाहती हूँ
पास मेरे हर पल रहो मैं तुम्हारी बाहों में सोना चाहती हूँ।
उस हवा से मेरी नाराज़गी दूर हो गई,
वो किसी और को उसका प्यार याद दिलाने चली गई।
सचमुच आज बड़ी अजीब थी हवा,
वो बन गई थी मेरे हर मर्ज की दवा।
न जाने वो मुझे छूकर किसके पास गई है,
उसे सोचकर मेरी आँखें भर गई है।
कितनी कोमल, कितनी समझदार थी वो,
मेरे लिए किसी तोहफे की हकदार थी वो।
उस अजब सी हवा की गजब सी अदा थी,
मैं सारे जहाँ को भूल उस पर फिदा थी।
उस हवा को अलविदा कह मैं सोने लगी थी,
और तुम्हारे बातों की हसीं यादों में खोने लगी थी।